विधायक संरक्षण में खनन? ग्रामीणों ने रात में खोला मोर्चा
दुर्ग/दुर्ग जिले के धमधा ब्लॉक के बोरी क्षेत्र से अवैध रेत खनन को लेकर एक बार फिर बड़ा और संवेदनशील मामला सामने आया है। शिवनाथ नदी के डोमा-पथरिया घाट में देर रात भारी मशीनों से कथित तौर पर रेत उत्खनन किए जाने की खबर ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है। ग्रामीणों के विरोध, मशीनों के मौके पर छोड़कर लोगों के फरार होने और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने इस पूरे मामले को अब सिर्फ खनन विवाद नहीं, बल्कि सत्ता, सिस्टम और संसाधनों के गठजोड़ के सवालों के केंद्र में ला खड़ा किया है।
जानकारी के मुताबिक, बीती रात डोमा घाट के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को नदी किनारे भारी मशीनों और वाहनों की आवाज सुनाई दी। शक होने पर गांव के कई लोग एकजुट होकर घाट की ओर पहुंचे। ग्रामीणों का आरोप है कि वहां चेन माउंटेन मशीनों और अन्य भारी उपकरणों की मदद से नदी से बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा रही थी। जैसे ही ग्रामीण मौके पर पहुंचे, वहां मौजूद कथित रेत कारोबारी और उनके सहयोगी मशीनें छोड़कर अंधेरे का फायदा उठाकर मौके से फरार हो गए।
घटना की खबर गांव में फैलते ही बड़ी संख्या में लोग घाट पहुंचने लगे। ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिली। लोगों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब रात के अंधेरे में नदी का सीना छलनी किया जा रहा हो। उनका आरोप है कि लंबे समय से शिवनाथ नदी के कई घाटों में इसी तरह मशीनों के जरिए अवैध खनन किया जा रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभाग कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति करते नजर आते हैं।
मामले को और गंभीर तब माना जा रहा है जब कुछ ग्रामीणों ने खुलकर स्थानीय राजनीतिक संरक्षण की बात कही। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इस पूरे नेटवर्क को कुछ प्रभावशाली लोगों का संरक्षण प्राप्त है। कुछ लोगों ने साजा विधायक ईश्वर साहू, उनके निज सहायक सचिव अनुज वर्मा और उनसे जुड़े कुछ करीबी लोगों के नाम लेते हुए संरक्षण देने के आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो पाई है, लेकिन ग्रामीणों के खुले आरोपों ने क्षेत्र की राजनीति में हलचल जरूर बढ़ा दी है।
ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि मौके पर मौजूद लोगों द्वारा कुछ दस्तावेज दिखाकर खनन को वैध बताने की कोशिश की गई। बताया जा रहा है कि कथित तौर पर खनिज विभाग की अनुमति होने का दावा किया गया, ताकि विरोध कर रहे ग्रामीणों को डराया या भ्रमित किया जा सके। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि अनुमति वास्तविक थी, तो रात के अंधेरे में भारी मशीनों से काम करने की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि सब कुछ नियमों के तहत हो रहा था, तो ग्रामीणों के पहुंचते ही लोग मशीनें छोड़कर क्यों भागे?
स्थानीय लोगों का कहना है कि अवैध खनन का सीधा असर नदी के अस्तित्व, पर्यावरण और आसपास के खेती-किसानी पर पड़ रहा है। लगातार मशीनों से रेत निकालने के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो रहा है और जलस्तर में भी बदलाव की आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने जल्द कार्रवाई नहीं की, तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
सबसे बड़ा सवाल अब प्रशासनिक जिम्मेदारी पर खड़ा हो रहा है। जब नदी घाटों में रात के समय भारी मशीनें उतर रही थीं, तब खनिज विभाग, राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन आखिर कहां था? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई थीं?
अब पूरे क्षेत्र की नजर प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी है। क्या इस मामले में सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी, या फिर आरोपों के घेरे में आए बड़े नामों की भी निष्पक्ष जांच होगी? डोमा घाट से उठी ग्रामीणों की आवाज अब सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुकी है।


